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आस्था, लोककला और रोमांच का दिखा संगम; अग्नि प्रदर्शन देखने के लिए सड़कों पर उमड़े श्रद्धालु

बयाना। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की परिवर्तिनी एकादशी के पावन अवसर पर मंगलवार को बयाना नगर में ठाकुर जी का डोला श्रद्धा और उल्लास के साथ निकाला गया। डोला यात्रा के दौरान भक्ति, लोककला और धार्मिक परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिला। ठाकुर जी के दर्शन करने तथा यात्रा में शामिल जीवंत झांकियों को देखने के लिए नगर के प्रमुख मार्गों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित हुए।

डोला यात्रा में भगवान शिव और उनके गणों का स्वरूप धारण किए कलाकारों ने आकर्षक प्रस्तुतियां दीं। कलाकारों की वेशभूषा, शरीर पर लगाए गए रंग, रुद्राक्ष की मालाएं और धार्मिक पात्रों के अनुरूप प्रस्तुत की गई भाव-भंगिमाओं ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। एक कलाकार द्वारा किया गया अग्नि प्रदर्शन यात्रा के प्रमुख आकर्षणों में रहा। आग की ऊंची लपटों के बीच दी गई प्रस्तुति को देखकर दर्शक रोमांचित हो उठे।

सड़क के दोनों ओर खड़े लोगों ने कलाकारों की प्रस्तुतियां देखीं और अपने मोबाइल फोन में तस्वीरें तथा वीडियो रिकॉर्ड किए। डोला यात्रा जिस मार्ग से गुजरी, वहां कुछ समय के लिए उत्सव जैसा वातावरण दिखाई दिया। श्रद्धालुओं ने ठाकुर जी के दर्शन कर परिवार, क्षेत्र और समाज में सुख-शांति तथा समृद्धि की कामना की।

भगवान के नगर भ्रमण की परंपरा

परिवर्तिनी एकादशी को राजस्थान सहित देश के विभिन्न हिस्सों में जलझूलनी एकादशी, देवझूलनी ग्यारस, पार्श्व एकादशी और डोल ग्यारस के नाम से भी जाना जाता है। इस अवसर पर मंदिरों में विराजमान भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण अथवा ठाकुर जी के विग्रह को सजाए गए डोले या पालकी में विराजमान कर नगर भ्रमण कराने की परंपरा है।

कई स्थानों पर ठाकुर जी के डोले को किसी तालाब, नदी, कुंड या अन्य जलस्रोत तक ले जाया जाता है। वहां भगवान का प्रतीकात्मक जलविहार, स्नान, पूजन और आरती की जाती है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस धार्मिक परंपरा का स्वरूप स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार बदल जाता है। कहीं ठाकुर जी को पालने में झुलाया जाता है तो कहीं भजन-कीर्तन, धार्मिक झांकियों और लोककलाकारों की प्रस्तुतियों के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है।

बयाना में निकले ठाकुर जी के डोले में भी धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय कला और सार्वजनिक सहभागिता का सुंदर स्वरूप दिखाई दिया। बुजुर्गों से लेकर युवाओं और बच्चों तक ने यात्रा तथा झांकियों का आनंद लिया।

क्यों कहा जाता है परिवर्तिनी एकादशी?

धार्मिक मान्यता के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा के दौरान करवट बदलते हैं। भगवान के इसी परिवर्तन के कारण इस तिथि को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।

यह तिथि भगवान विष्णु और उनके वामन अवतार की आराधना के लिए विशेष मानी जाती है। श्रद्धालु इस दिन व्रत रखते हैं, भगवान विष्णु की पूजा करते हैं तथा भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लेते हैं। दान-पुण्य करने की परंपरा भी इस एकादशी से जुड़ी हुई है।

वामन भगवान और राजा बलि की कथा

परिवर्तिनी एकादशी को वामन एकादशी भी कहा जाता है। इससे जुड़ी प्रचलित धार्मिक कथा के अनुसार राजा बलि पराक्रमी होने के साथ भगवान विष्णु के परम भक्त और महान दानी थे। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी।

राजा बलि द्वारा संकल्प दिए जाने के बाद वामन भगवान ने विराट रूप धारण कर लिया। उन्होंने दो पगों में पृथ्वी और स्वर्ग को नाप लिया। तीसरा पग रखने के लिए स्थान नहीं बचा तो राजा बलि ने अपना सिर भगवान के चरणों में प्रस्तुत कर दिया। राजा बलि की भक्ति, वचनबद्धता और दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें आशीर्वाद दिया। इस धार्मिक प्रसंग के कारण परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा का भी विशेष महत्त्व बताया जाता है।

बालकृष्ण के जलवा पूजन से भी जुड़ी है लोकमान्यता

जलझूलनी एकादशी से संबंधित एक लोकमान्यता माता यशोदा और बालकृष्ण से भी जुड़ी है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के कुछ दिनों बाद माता यशोदा ने बालकृष्ण का जलवा पूजन किया था। बालकृष्ण को स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए गए और मंगल उत्सव मनाया गया। इसी परंपरा को कई क्षेत्रों में ठाकुर जी के जलविहार, पालकी और डोला यात्रा से जोड़कर देखा जाता है।

यह कथा अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग स्वरूप में सुनाई जाती है। राजस्थान में डोल ग्यारस के अवसर पर मंदिरों से ठाकुर जी की सवारी निकालने की परंपरा आज भी आस्था और उत्साह के साथ निभाई जाती है।

जीवंत झांकियों ने नई पीढ़ी को परंपरा से जोड़ा

बयाना में आयोजित डोला यात्रा के दौरान प्रस्तुत जीवंत झांकियों ने धार्मिक आयोजन को विशेष आकर्षण प्रदान किया। भगवान शिव और शिवगणों का रूप धारण किए कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से पौराणिक प्रसंगों को लोगों के सामने जीवंत किया।

इस प्रकार के धार्मिक आयोजन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इनके माध्यम से नई पीढ़ी को स्थानीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और लोककलाओं को समझने का अवसर भी मिलता है। परिवर्तिनी एकादशी पर निकला ठाकुर जी का डोला बयाना में आस्था, परंपरा और लोककला के यादगार संगम का साक्षी बना।

By Sanatani Sant Reporter

I am an exserviceman presently sadhak Bageshwar Balaji. Presently Working as a religious and social news reporter .

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