लोहागढ़ प्रेस क्लब ने फर्जी पहचान और कथित अवैध वसूली पर कार्रवाई मांगी; मंत्रालय के नोटिस में डिजिटल समाचार प्रकाशकों के लिए पूर्व पंजीकरण आवश्यक नहीं बताया गया
दस्तावेज आधारित विशेष रिपोर्ट | सुरेंद्र सिंह, सनातनी संत रिपोर्टर

कैप्शन: “लोहागढ़ प्रेस क्लब के प्रतिनिधि ज्ञापन सौंपते हुए। उपलब्ध पत्र में फर्जी मीडिया पहचान और कथित अवैध वसूली पर कार्रवाई की मांग की गई है।”
भरतपुर। पत्रकारिता के नाम पर फर्जी पहचान बनाना, लोगों को धमकाना और अवैध वसूली करना गंभीर चिंता का विषय है। ऐसी शिकायतों की प्रमाण आधारित जांच जरूरी है। साथ ही डिजिटल समाचार प्रकाशन, सरकारी पंजीकरण, पत्रकार अधिस्वीकृति और सूचना एवं जनसंपर्क कार्यालय की मीडिया सूची के बीच अंतर समझना भी आवश्यक है।
लोहागढ़ प्रेस क्लब के जिला कलेक्टर, भरतपुर को संबोधित ज्ञापन में फर्जी मीडिया पहचान और कथित अवैध वसूली के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। इस संदर्भ में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का सार्वजनिक नोटिस महत्वपूर्ण जानकारी देता है। मंत्रालय ने डिजिटल मीडिया प्रकाशकों के लिए पूर्व पंजीकरण आवश्यक नहीं बताया है, जबकि निर्धारित जानकारी देने का प्रावधान स्पष्ट किया है।
इन दोनों दस्तावेजों को साथ पढ़ने से स्पष्ट होता है कि किसी व्यक्ति के आचरण की जांच और उसके समाचार मंच की नियामक स्थिति का आकलन अलग प्रश्न हैं। केवल सोशल मीडिया पर समाचार प्रसारित करना किसी व्यक्ति या संस्थान के फर्जी होने का प्रमाण नहीं है।
ज्ञापन में क्या आरोप और मांगें हैं?
उपलब्ध ज्ञापन में प्रेस क्लब ने आरोप लगाया है कि कुछ लोग मीडिया संस्थानों के लोगो और फर्जी पहचान-पत्र का इस्तेमाल कर संस्थाओं, व्यापारियों तथा अन्य लोगों को डराते हैं और अवैध वसूली करते हैं। पत्र में दबाव बनाने के लिए सोशल मीडिया पर भ्रामक खबरें प्रसारित करने का आरोप भी लगाया गया है।
क्लब ने चिंता व्यक्त की है कि ऐसे आचरण से जिम्मेदार पत्रकारों की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है और समाचार संकलन के दौरान उन्हें भी संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। ज्ञापन में प्रशासन से कार्रवाई तथा सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के माध्यम से वैध मीडियाकर्मियों की सूची संबंधित विभागों को उपलब्ध कराने की मांग की गई है।
ये ज्ञापन में लगाए गए आरोप हैं। उपलब्ध दस्तावेज में किसी विशेष व्यक्ति के विरुद्ध आरोप सिद्ध होने, जांच पूरी होने या प्रशासन द्वारा इस मांग पर आदेश जारी करने का विवरण नहीं है। ज्ञापन एक मांग-पत्र है; इसे सरकारी आदेश नहीं समझना चाहिए।
मंत्रालय का सार्वजनिक नोटिस क्या कहता है?

कैप्शन: “मंत्रालय के 26 मई 2021 के सार्वजनिक नोटिस का पैरा 3—डिजिटल मीडिया प्रकाशकों के लिए पूर्व पंजीकरण आवश्यक नहीं; निर्धारित जानकारी देने का प्रावधान।”
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के डिजिटल मीडिया विभाग ने 26 मई 2021 को डिजिटल मीडिया प्रकाशकों से जानकारी प्राप्त करने के विषय में सार्वजनिक नोटिस जारी किया था। इसके पैरा 3 में स्पष्ट किया गया है कि डिजिटल मीडिया प्रकाशकों के लिए मंत्रालय में पूर्व पंजीकरण आवश्यक नहीं है। इसके स्थान पर IT Rules, 2021 के नियम 18 के तहत निर्धारित जानकारी मंत्रालय को देने का प्रावधान है।
यह मूल नोटिस 30 मई 2025 के संशोधित नोटिस के साथ भी संलग्न है।
इसका सही अर्थ है कि मंत्रालय का पूर्व पंजीकरण डिजिटल समाचार प्रकाशन शुरू करने की अनिवार्य शर्त नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि डिजिटल समाचार मंचों पर कोई कानून या नियम लागू नहीं होता।
इसी तरह मंत्रालय को जानकारी भेजने को पत्रकार का सरकारी लाइसेंस, अधिस्वीकृति या प्रत्येक प्रकाशित खबर की सरकारी मंजूरी नहीं समझना चाहिए।
बड़े मीडिया संस्थान और स्वतंत्र डिजिटल मंच
सोशल मीडिया पर समाचार प्रसारण की चर्चा में यह ध्यान रखना जरूरी है कि डिजिटल माध्यम केवल छोटे समाचार मंचों तक सीमित नहीं है। पारंपरिक टीवी और समाचारपत्र संस्थानों के डिजिटल समाचार संचालन को भी मंत्रालय के नोटिस में शामिल किया गया है।
नोटिस में पारंपरिक टीवी एवं समाचारपत्रों के साथ डिजिटल समाचार प्रकाशित करने वाले संस्थानों के लिए Appendix I, जबकि अन्य डिजिटल समाचार प्रकाशकों के लिए Appendix II का प्रारूप दिया गया है।
इसलिए किसी समाचार का फेसबुक, यूट्यूब या अन्य ऑनलाइन माध्यम पर प्रकाशित होना अपने आप में उसकी विश्वसनीयता तय नहीं करता। महत्वपूर्ण प्रश्न हैं—खबर के तथ्य क्या हैं, स्रोत कौन हैं, संबंधित पक्ष का जवाब शामिल है या नहीं और प्रकाशक अपनी संपादकीय जिम्मेदारी कैसे निभाता है।
क्या दोनों श्रेणियों पर बिल्कुल समान नियम हैं?
डिजिटल समाचार प्रकाशन के संबंधित प्रावधान पारंपरिक संस्थानों के ऑनलाइन संचालन और स्वतंत्र डिजिटल समाचार प्रकाशकों, दोनों के लिए प्रासंगिक हैं। हालांकि संस्थागत स्थिति, जानकारी देने के प्रारूप और अन्य लागू दायित्व अलग हो सकते हैं।
इसलिए यह कहना कि हर संस्थान की प्रत्येक औपचारिकता बिल्कुल समान है, सही नहीं होगा। वहीं किसी संस्थान का प्रिंट पंजीकरण या टीवी प्रसारण की अनुमति होना उसके डिजिटल संचालन के सभी दायित्वों से स्वतः छूट मिलने का प्रमाण भी नहीं है।
संस्थान का आकार और समाचार प्रसारण का माध्यम, किसी खबर की तथ्यात्मक जांच का विकल्प नहीं हैं।
हर सोशल मीडिया उपयोगकर्ता समाचार प्रकाशक नहीं होता
IT Rules, 2021 की परिभाषा में ऑनलाइन समाचारपत्र, समाचार पोर्टल, समाचार एजेंसी और इसी प्रकार का काम करने वाली अन्य इकाइयां शामिल हैं। ऐसे व्यक्तिगत उपयोगकर्ताओं को अलग रखा गया है जो व्यवस्थित व्यावसायिक, पेशेवर या वाणिज्यिक गतिविधि के रूप में सामग्री प्रसारित नहीं करते।
इसलिए निजी खाते से कभी-कभार किसी घटना का वीडियो साझा करना और नियमित समाचार मंच चलाना अलग परिस्थितियां हैं। किसी मंच की स्थिति उसके वास्तविक काम और संचालन के आधार पर समझी जानी चाहिए।
पीआरओ सूची और समाचार प्रकाशन में क्या अंतर है?
मीडिया संपर्क सूची, पत्रकार अधिस्वीकृति, सरकारी विज्ञापन की पात्रता और कार्यक्रम का प्रवेश-पास अलग व्यवस्थाएं हैं। संबंधित सूची या सुविधा का उद्देश्य उसके लागू आदेश से तय होता है।
मंत्रालय का उपर्युक्त नोटिस डिजिटल समाचार प्रकाशन के लिए स्थानीय पीआरओ सूची में नाम होना अनिवार्य शर्त नहीं बताता। इसलिए केवल सूची में नाम न होने से किसी मंच के समाचार प्रकाशन को प्रतिबंधित मान लेने का निष्कर्ष नहीं निकलता।
भरतपुर की संबंधित मीडिया सूची का मूल आदेश इस रिपोर्ट के लिए उपलब्ध नहीं है। इसलिए उस सूची से जुड़ी विशिष्ट सुविधाओं और प्रतिबंधों पर निष्कर्ष नहीं दिया जा रहा है।
यदि किसी कार्यालय द्वारा सूची के आधार पर कोई प्रतिबंध बताया जाता है तो उसका संबंधित नियम या लिखित आदेश स्पष्ट होना चाहिए। इससे पत्रकार और अधिकारी, दोनों अपनी स्थिति सही ढंग से समझ सकेंगे।
गांवों की छोटी समस्याओं का भी महत्व
बड़े मीडिया संस्थानों की संपादकीय प्राथमिकताएं और संसाधनों की सीमाएं होती हैं। स्थानीय डिजिटल मंच गांवों तथा कस्बों की उन समस्याओं को सार्वजनिक चर्चा में लाने का माध्यम बन सकते हैं जिन्हें व्यापक कवरेज नहीं मिलती।
पेयजल, टूटी सड़क, जलभराव, विद्यालय की स्थिति, अस्पताल की व्यवस्था और सार्वजनिक निर्माण की गुणवत्ता जैसे मुद्दे स्थानीय लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। इनकी तथ्य आधारित रिपोर्टिंग का महत्व संस्थान के आकार या कैमरे की कीमत से तय नहीं होना चाहिए।
हालांकि किसी खबर के कारण प्रशासनिक कार्रवाई या समस्या का समाधान होने का दावा तभी किया जाना चाहिए जब उसकी पुष्टि उपलब्ध हो। समस्या सामने लाना और उसका समाधान होना अलग बातें हैं।
जानकारी मांगना और कैमरे पर बयान मिलना अलग हैं
डिजिटल पत्रकार संबंधित विभाग से प्रश्न पूछ सकता है, उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी मांग सकता है और किसी आरोप पर अधिकारी का पक्ष लेने का प्रयास कर सकता है। संस्थान की पहचान और संबद्धता का सत्यापन भी उपयोगी हो सकता है।
लेकिन किसी अधिकारी को हर बार तत्काल कैमरे पर इंटरव्यू देने के लिए बाध्य मानना सही नहीं होगा। विभाग लिखित जवाब, अधिकृत प्रवक्ता, प्रेस नोट या अन्य निर्धारित माध्यम से जानकारी दे सकता है।
कार्यालय के भीतर रिकॉर्डिंग, प्रतिबंधित परिसर में प्रवेश और सुरक्षा वाले कार्यक्रम की कवरेज पर संबंधित व्यवस्थाएं लागू हो सकती हैं। मंत्रालय का पूर्व पंजीकरण आवश्यक नहीं होने वाला नोटिस इन व्यवस्थाओं से छूट नहीं देता।
उपलब्ध दस्तावेज और रिकॉर्डिंग कैसे मांगी जा सकती है?
किसी विभाग के पास पहले से मौजूद दस्तावेज या रिकॉर्डिंग की प्रति मांगना और नया इंटरव्यू रिकॉर्ड करवाना अलग विषय हैं।
सूचना का अधिकार कानून नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरण के पास मौजूद या उसके नियंत्रण में उपलब्ध रिकॉर्ड तथा इलेक्ट्रॉनिक सूचना प्राप्त करने का रास्ता देता है। यह अधिकार निर्धारित प्रक्रिया और लागू अपवादों के अधीन है। इसके लिए पत्रकार होना या पीआरओ सूची में शामिल होना आवश्यक नहीं है।
इसे प्रत्येक मांग पर नया वीडियो बयान या नई जानकारी तैयार करवाने की गारंटी के रूप में नहीं समझना चाहिए।
आलोचनात्मक खबर और वसूली के आरोप में फर्क
किसी ठेकेदार, कारोबारी या विभाग के काम पर सवाल उठाने वाली खबर से संबंधित पक्ष नाराज हो सकता है। उसकी शिकायत सुनी जानी चाहिए और खबर के तथ्य जांचे जाने चाहिए।
लेकिन आलोचनात्मक खबर अपने आप में वसूली का प्रमाण नहीं है। दूसरी ओर खबर रोकने, बदलने या प्रतिष्ठा खराब करने की धमकी देकर पैसे मांगने का आरोप हो तो बातचीत, संदेश और अन्य उपलब्ध प्रमाणों की जांच आवश्यक है।
बिना प्रमाण यह निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा कि कोई पत्रकार संगठन डिजिटल पत्रकारों को रोकना चाहता है या कोई बड़ा मीडिया संस्थान जानबूझकर खबर दबाता है। निष्पक्ष जांच में संबंधित पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।
जवाबदेही की कसौटी स्पष्ट हो
फर्जी पहचान और कथित अवैध वसूली की शिकायतों पर प्रमाण आधारित जांच पत्रकारिता की साख के लिए जरूरी है। साथ ही स्वतंत्र डिजिटल समाचार मंचों की स्थिति का आकलन सही सरकारी दस्तावेजों के आधार पर होना चाहिए।
तथ्य जांचना, आरोप को आरोप के रूप में प्रस्तुत करना, संबंधित पक्ष का जवाब लेना और गलती मिलने पर सुधार करना जिम्मेदार पत्रकारिता की महत्वपूर्ण कसौटियां हैं। विज्ञापन और समाचार का अंतर भी पाठकों के सामने स्पष्ट रहना चाहिए।
पीआरओ सूची, सरकारी अधिस्वीकृति, विशेष कार्यक्रम में प्रवेश और समाचार प्रकाशन को एक ही व्यवस्था मानने से भ्रम पैदा होता है। इनका अंतर समझना जनता, प्रशासन और पत्रकारों—सभी के लिए उपयोगी है।
संपादकीय टिप्पणी: यह रिपोर्ट उपलब्ध ज्ञापन और मंत्रालय के सार्वजनिक नोटिस में दिए गए पंजीकरण संबंधी स्पष्टीकरण पर आधारित है। ज्ञापन के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है। डिजिटल मीडिया के सभी कानूनी दायित्वों का संपूर्ण परीक्षण इसमें नहीं किया गया है। किसी व्यक्ति को दोषी या किसी अधिकारी द्वारा अनुचित प्रतिबंध लगाए जाने का निष्कर्ष इसमें नहीं दिया गया है।
