बयाना (भरतपुर)। ग्रामीण युवाओं को खेल सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लाखों रुपये खर्च कर खेल मैदान विकसित किए जाते हैं, लेकिन यदि किसी खेल मैदान का बाकायदा लोकार्पण हो जाने के करीब तीन साल बाद भी वहां खिलाड़ी नहीं बल्कि बड़ी-बड़ी झाड़ियां दिखाई दें, मुख्य गेट पर ताला लटका हो और लोहे का गेट जंग खा रहा हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सरकारी धन खर्च करने का उद्देश्य कितना पूरा हुआ?
ऐसा ही मामला भरतपुर जिले के बयाना उपखंड की ग्राम पंचायत दहगांव में सामने आया है। यहां राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय से जुड़े खेल मैदान की मौजूदा स्थिति कई सवाल खड़े कर रही है।
मैदान के अंदर बड़े हिस्से में घास और झाड़ियां उगी हुई हैं। कई पौधे इतने बड़े हो चुके हैं कि प्रथम दृष्टया मैदान नियमित खेल गतिविधियों के योग्य दिखाई नहीं देता। प्रवेश द्वार पर लगे लोहे के गेट पर जंग नजर आ रही है और गेट बंद है।
14 अप्रैल 2023 को हो चुका है खेल मैदान का लोकार्पण

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य मैदान के बाहर लगा हुआ शिलापट्ट है।
शिलापट्ट पर स्पष्ट रूप से “खेल मैदान निर्माण रा.उ.मा.वि. दहगांव – लोकार्पण” अंकित है। इस पर लोकार्पण की तारीख 14 अप्रैल 2023 दर्ज है। शिलापट्ट पर तत्कालीन पंचायत समिति प्रधान मुकेश कोली, पूर्व प्रधान महेंद्र तिवारी सहित संबंधित अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों के नाम भी अंकित दिखाई देते हैं।
यहीं से एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है।
यदि खेल मैदान के निर्माण का 14 अप्रैल 2023 को विधिवत लोकार्पण किया जा चुका था, तो अब निर्माण को अधूरा बताए जाने का आधार क्या है?
हालांकि केवल लोकार्पण का शिलापट्ट अपने आप में इस बात का अंतिम तकनीकी या कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता कि स्वीकृत योजना के प्रत्येक कार्य का शत-प्रतिशत निर्माण पूरा हो चुका था। किसी निर्माण की वास्तविक पूर्णता का निर्धारण प्रशासनिक एवं तकनीकी रिकॉर्ड, माप पुस्तिका (MB), पूर्णता प्रमाण-पत्र तथा अन्य आधिकारिक अभिलेखों से ही होगा।
लेकिन सामान्य रूप से लोकार्पण किसी सार्वजनिक परिसंपत्ति को तैयार अथवा उपयोग के लिए जनता को समर्पित किए जाने का महत्वपूर्ण संकेत जरूर माना जाता है।
इसलिए अब सवाल यह है कि लोकार्पण के समय खेल मैदान के कौन-कौन से कार्य पूरे थे और कौन-कौन से कार्य शेष थे?
निर्माण अधूरा था तो लोकार्पण क्यों? पूरा था तो मैदान बदहाल क्यों?

दहगांव खेल मैदान के मामले में यही सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने आ रहा है।
यदि आधिकारिक रिकॉर्ड में यह सामने आता है कि 14 अप्रैल 2023 को लोकार्पण के समय निर्माण कार्य अधूरा था, तो यह जानना जरूरी होगा कि उस समय कौन से कार्य पूरे हुए थे और किन कार्यों के लिए बाद में राशि स्वीकृत की गई।
और यदि लोकार्पण के समय स्वीकृत कार्य पूर्ण हो चुके थे, तो सवाल और गंभीर हो जाता है कि खेल मैदान आज इस स्थिति में क्यों पहुंच गया?
दोनों ही परिस्थितियों में रखरखाव का सवाल अपनी जगह बना रहता है।
निर्माण पूरा हो या कुछ हिस्सा अधूरा—जो चारदीवारी, गेट और मैदान तैयार हो चुका था, कम से कम उसकी नियमित साफ-सफाई और झाड़ियों की कटाई तो की जा सकती थी।
20 से 25 लाख खर्च होने का दावा, लेकिन आधिकारिक पुष्टि बाकी

खेल मैदान पर खर्च हुई कुल राशि को लेकर भी अलग-अलग जानकारियां सामने आ रही हैं।
स्थानीय स्रोतों के अनुसार अलग-अलग चरणों में इस मैदान पर लगभग 20 से 25 लाख रुपये तक खर्च होने की बात कही जा रही है। हालांकि ‘सनातनी संत रिपोर्टर’ इस राशि की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता।
यही कारण है कि खबर में इस आंकड़े को अंतिम या प्रमाणित राशि के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है।
वास्तविक राशि कितनी स्वीकृत हुई, कितनी राशि जारी हुई, कितनी राशि खर्च हुई और किन-किन कार्यों पर भुगतान किया गया—इसका सही जवाब आधिकारिक दस्तावेज सामने आने के बाद ही मिलेगा।
सरपंच से मांगी जानकारी, खर्च का स्पष्ट आंकड़ा नहीं मिला
मामले को लेकर ग्राम पंचायत की सरपंच भागवत कली से भी संपर्क किया गया। उनसे खेल मैदान की वर्तमान स्थिति तथा इस पर खर्च हुई कुल राशि के संबंध में जानकारी लेने का प्रयास किया गया।
बातचीत में अलग-अलग चरणों में कार्य और राशि आने की बात सामने आई, लेकिन खेल मैदान पर अब तक कुल कितनी राशि खर्च हुई और कितना निर्माण कार्य शेष है, इसका स्पष्ट एवं संतोषजनक आंकड़ा प्राप्त नहीं हो सका।
ग्राम पंचायत सचिव/ग्राम विकास अधिकारी से भी संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन समाचार तैयार किए जाने तक उनसे विस्तृत जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी।
ग्राम पंचायत, सरपंच, ग्राम विकास अधिकारी, पंचायत समिति अथवा संबंधित तकनीकी अधिकारी की ओर से यदि इस मामले में आधिकारिक आंकड़े या विस्तृत पक्ष उपलब्ध कराया जाता है तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
ग्रामीणों में नाराजगी, बोले—हिसाब सामने आना चाहिए
मैदान की मौजूदा स्थिति को लेकर स्थानीय स्तर पर नाराजगी भी सामने आ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि सरकारी राशि खर्च करके युवाओं के लिए खेल मैदान बनाया गया था तो वह खिलाड़ियों के उपयोग में आना चाहिए।
कुछ ग्रामीण खर्च और मौके की स्थिति को लेकर संदेह जताते हुए “दाल में कुछ काला है” जैसी बात भी कह रहे हैं और पूरे खर्च का हिसाब सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं।
हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये ग्रामीणों की आशंकाएं और आरोप हैं। किसी वित्तीय अनियमितता का प्रमाण नहीं।
किसी भी प्रकार के सरकारी धन के दुरुपयोग या वित्तीय अनियमितता का निष्कर्ष सक्षम जांच, आधिकारिक रिकॉर्ड एवं प्रमाणों के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
RTI खोलेगी फाइल—कितना पैसा आया, कहां हुआ खर्च?
अब ‘सनातनी संत रिपोर्टर’ इस खेल मैदान से संबंधित आधिकारिक जानकारी RTI के माध्यम से प्राप्त करने का प्रयास करेगा।
सूचना के अधिकार के तहत खेल मैदान की प्रशासनिक स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति, कुल स्वीकृत राशि, अलग-अलग किस्तों में प्राप्त राशि, कार्यादेश, भुगतान विवरण, माप पुस्तिका (MB), सामग्री एवं मजदूरी पर खर्च, कार्य की वर्तमान पूर्णता स्थिति, पूर्णता प्रमाण-पत्र और उपयोगिता प्रमाण-पत्र जैसी जानकारियां मांगी जा सकती हैं।
रिकॉर्ड सामने आने के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि स्थानीय स्तर पर बताए जा रहे लगभग 20–25 लाख रुपये के आंकड़े में कितनी सच्चाई है।
साथ ही यह भी पता चलेगा कि जिस कार्य का 14 अप्रैल 2023 को लोकार्पण किया गया, उस तारीख तक आधिकारिक रिकॉर्ड में कितने प्रतिशत कार्य पूर्ण बताया गया था।
लाखों की संपत्ति बनाई तो रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी?
इस मामले में केवल निर्माण की लागत ही मुद्दा नहीं है। सरकारी संपत्ति के रखरखाव का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यदि लाखों रुपये खर्च करके मैदान की चारदीवारी बनाई गई, गेट लगाया गया और अन्य कार्य किए गए तो उस सरकारी संपत्ति को सुरक्षित और उपयोगी बनाए रखने की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
तस्वीरों में मैदान में बड़ी-बड़ी झाड़ियां स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। मुख्य गेट की स्थिति भी नियमित रखरखाव पर सवाल खड़े करती है।
यदि समय-समय पर घास और झाड़ियां कटवाई जातीं तथा मैदान की सफाई होती रहती तो कम से कम परिसर इस तरह जंगल जैसी स्थिति में नहीं पहुंचता।
युवाओं के लिए बना मैदान आखिर युवाओं के काम कब आएगा?
गांवों में खेल मैदान केवल निर्माण कार्य नहीं बल्कि युवाओं के भविष्य से जुड़ी सुविधा है। ग्रामीण युवाओं को दौड़, कबड्डी, क्रिकेट, वॉलीबॉल और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की शारीरिक तैयारी के लिए खुले एवं सुरक्षित मैदान की आवश्यकता होती है।
इसलिए दहगांव के ग्रामीणों के सामने सवाल केवल लाखों रुपये के हिसाब का नहीं है। सवाल यह भी है कि जिस मैदान का लोकार्पण अप्रैल 2023 में हो चुका है, उसका लाभ गांव के युवाओं को आखिर कब मिलेगा?
फिलहाल किसी वित्तीय गड़बड़ी का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आने का इंतजार करना आवश्यक है। लेकिन मौके की तस्वीरें और शिलापट्ट अपने आप में कुछ महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़े कर रहे हैं—
जब लोकार्पण हो चुका था तो निर्माण की वास्तविक स्थिति क्या थी?
लोकार्पण के समय कौन से कार्य पूरे और कौन से अधूरे थे?
अब तक वास्तव में कितनी सरकारी राशि खर्च हुई?
और सबसे बड़ा सवाल—लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद खेल मैदान में खिलाड़ियों की जगह झाड़ियां क्यों खड़ी हैं?
इन सवालों के जवाब अब आधिकारिक दस्तावेजों से सामने आने बाकी हैं।
स्पष्टीकरण: खबर में लगभग ₹20–25 लाख खर्च होने का आंकड़ा स्थानीय स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है, जिसकी ‘सनातनी संत रिपोर्टर’ स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता। किसी वित्तीय अनियमितता का दावा नहीं किया जा रहा है। संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड तथा सभी पक्षों की जानकारी सामने आने पर खबर को तथ्यों के अनुसार अपडेट किया जाएगा।
