ब्रज क्षेत्र (84 कोस परिक्रमा मार्ग )से विशेष रिपोर्ट
ब्रज क्षेत्र इन दिनों आस्था, श्रद्धा और विश्वास के ऐसे अद्भुत दृश्य का साक्षी बन रहा है, जिसने आधुनिक जीवन की भागदौड़ और भौतिक सुख-सुविधाओं को पीछे छोड़ दिया है। विश्व प्रसिद्ध 84 कोस ब्रज परिक्रमा, जिसकी दूरी लगभग 252 किलोमीटर मानी जाती है, इस समय श्रद्धालुओं की भारी भीड़ से गुलजार है। अधिक मास के पावन अवसर पर परिक्रमा में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में इस वर्ष ऐतिहासिक वृद्धि देखी जा रही है।
लेकिन इस भीड़ के बीच एक दृश्य ऐसा है जिसने हर किसी को भावुक और प्रेरित कर दिया है—84 वर्षीय एक बुजुर्ग महिला, जो हाथ में लाठी लिए, झुकी हुई कमर और कमजोर दृष्टि के बावजूद, इस कठिन यात्रा को पूरी श्रद्धा और अटूट विश्वास के साथ पूरा करने में जुटी हुई हैं।
स्थानीय श्रद्धालु उन्हें प्रेम से “84 साल की अम्मा” कहकर पुकार रहे हैं, जिनकी भक्ति और हौसला देखकर हर कोई नतमस्तक हो जा रहा है।
तपता जेठ और 50 डिग्री की चुनौतीपूर्ण गर्मी
वर्तमान समय में जेठ का महीना अपने चरम पर है। राजस्थान और उत्तर भारत के इस पूरे क्षेत्र में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंच रहा है। नौतपा की शुरुआत के साथ ही सूरज मानो आग बरसा रहा है।
धरती इतनी तप रही है कि नंगे पांव चलना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। गर्म हवाएं लू के थपेड़ों की तरह शरीर को झुलसा रही हैं, लेकिन इसके बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह और आस्था अडिग दिखाई दे रही है।
इसी भीषण गर्मी में यह 84 वर्षीय अम्मा बिना किसी आधुनिक सुविधा के, केवल भक्ति के सहारे आगे बढ़ रही हैं। उनके कदम धीमे जरूर हैं, लेकिन उनका संकल्प अडिग है।
84 कोस ब्रज परिक्रमा: आस्था का जीवंत स्वरूप
84 कोस ब्रज परिक्रमा केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की गहराई में डूबी एक दिव्य परंपरा है। माना जाता है कि यह परिक्रमा भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़े पवित्र स्थलों को जोड़ती है।
इस यात्रा में हर कदम पर भक्ति, हर मोड़ पर आस्था और हर पड़ाव पर श्रद्धा का अनुभव होता है।
हजारों की संख्या में श्रद्धालु—
बच्चे
युवा
महिलाएं और वृद्धजन
सब “राधे-राधे” के जयघोष के साथ नंगे पांव इस कठिन मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं।
84 वर्षीय अम्मा बनीं प्रेरणा का केंद्र
इस भीड़ में सबसे अलग पहचान बन चुकी हैं 84 वर्षीय यह बुजुर्ग महिला। डीह क्षेत्र के परिक्रमा मार्ग पर जब लोगों ने उन्हें धीरे-धीरे चलते हुए देखा तो हर कोई ठहर गया।
हाथ में साधारण लकड़ी की लाठी
झुकी हुई कमर
मौसम की मार से झुलसा चेहरा
लेकिन चेहरे पर अद्भुत शांति और मुस्कान
यह दृश्य देखने वालों को भावुक कर देता है।
श्रद्धालु कहते हैं कि यह केवल यात्रा नहीं, बल्कि आस्था की वह शक्ति है जो शरीर की सीमाओं को भी पार कर जाती है।
लोग उनके चरण छूकर आशीर्वाद ले रहे हैं और कह रहे हैं— “वाह! क्या भक्ति है… 84 साल की उम्र में भी इतनी अटूट श्रद्धा!”
सनातन परंपरा की जीवंत झलक
यह पूरा दृश्य सनातन धर्म की उस गहराई को दर्शाता है जहां आस्था उम्र, मौसम और परिस्थितियों की मोहताज नहीं होती।
यहां भक्ति केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन का मार्ग बन जाती है।
भीषण गर्मी, तपती धरती और कठिन रास्तों के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह यह सिद्ध करता है कि सनातन परंपरा केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक दिव्य शैली है।
कठिन परिस्थितियों में भी अडिग आस्था
मार्ग में कई स्थानों पर श्रद्धालुओं के लिए अस्थायी विश्राम स्थल, जल सेवा और भंडारे लगाए गए हैं। सामाजिक संगठन और स्थानीय सेवक लगातार यात्रियों की सहायता कर रहे हैं।
लेकिन सबसे प्रेरणादायक दृश्य वही है जहां यह 84 वर्षीय अम्मा बिना किसी सहारे के आगे बढ़ती जा रही हैं।
उनका कहना है (स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार) कि— “जब मन में ठाकुर जी का नाम हो, तो शरीर की थकान महसूस नहीं होती।”
84 कोस ब्रज परिक्रमा का यह दृश्य केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं , बल्कि मानव अवस्था कि उसे शक्ति का प्रमाण है जो हर बाधा को पार कर सकती है |
84 वर्षीय बुजुर्ग महिला की यात्रा यह संदेश देती है कि-” उम्र केवल एक संख्या है, और भक्ति वह ऊर्जा है जो इंसान को असंभव को भी संभव बनाने की शक्ति देती है” |
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