प्रताप के सहयोद्धा, आज उपेक्षा के साये में-गाड़िया लोहारों की पीड़ा किसकी जिम्मेदारी ?

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आज़ादी के 8 दशक बाद भी खुले में शौच, कच्चे आशियाने और मूलभूत सुविधाओं से वंचित-स्वच्छ भारत सहित प्रशासन के सभी दावे खोखले साबित
बयाना. मुगलों के विरुद्ध संघर्ष में मेवाड़ के शौर्य और अस्मिता की ढाल बने महाराणा प्रताप के विश्वस्त साथियों में गाड़िया लोहारों का नाम सम्मान से लिया जाता है। वे वही लोग हैं जिन्होंने हल्दीघाटी के रण में प्रताप के लिए तलवारें गढ़ीं, भट्टियों की आग में साहस को तपाया, और मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए घर-द्वार तक छोड़ दिए। तब उन्होंने प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक मातृभूमि स्वतंत्र नहीं होगी, तब तक वे स्थाई मकान नहीं बनायेंगे।
लेकिन आज-आजादी के आठ दशक बाद भी इस योद्धा-वंश के वारिस मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। कस्बे के बीच बसे, फिर भी विकास से दूर
कस्बे की पंचायत समिति की स्वामित्व भूमि पर, राजकीय देवनारायण कन्या महाविद्यालय के ठीक सामने, यह घुमंतू समुदाय परंपरागत रूप से अपने अस्थायी तम्बूओं में जीवन बसर कर रहा है। तिरपालों से ढकी झोपड़ियाँ, लकड़ी और कबाड़ से टिका आशियाना, और पास में जलती भट्ठी, यही इनका संसार है।
सरकारें अपनी उपलब्धियों में स्वच्छ भारत मिशन, ओडीएफ (खुले में शौच मुक्त) जिले, जन-सुविधाओं के विस्तार की लंबी सूची गिनाती हैं, लेकिन इस समुदाय की बस्ती इन दावों की पोल खोल देती है।

सुविधाओं का अभाव, और शर्मिंदगी भरा जीवन :
यहाँ ना शौचालय, ना नल का पानी, ना बिजली का नियमित कनेक्शन, ना आवास योजना का लाभ। महिलाएँ और बच्चे आज भी खुले में शौच को जाने पर मजबूर हैं। समाज के बीच रहते हुए भी एक अपमान और उपेक्षा का बोझ ढोते हैं। नगरपालिका प्रशासन सार्वजनिक शौचालय बनाने के दावे जरूर करता है, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। एक बुजुर्ग गाड़िया लोहार की आवाज आज भी कचोटती है कि हमने प्रताप के लिए घर छोड़े थे, आज सरकार ने हमें घर जैसा हक भी नहीं दिया।

भट्ठी की आग में जिंदा संघर्ष :
गाड़िया लोहारों की पहचान उनके औजारों की तपन है। दरांती, हंसिया, फावड़ा, कुल्हाड़ी, कुदाल। इनकी भट्ठियाँ आज भी किसान और मजदूर दोनों की जरूरतें पूरी करती हैं। लेकिन बदलते समय में अब इनके कौशल का मूल्य नहीं, बल्कि उनकी मज़बूरी देखी जा रही है। जहाँ आधुनिक मशीनें सुविधा देती हैं, वहीं ये लोग अपनी पीढ़ियों से चली आ रही कारीगरी के सहारे पेट पालने की लड़ाई लड़ते हैं।

स्वाभिमान की सबसे बड़ी कीमत, उपेक्षा!
यह विडंबना ही है कि जो समुदाय महाराणा प्रताप के आदर्शों पर अडिग रहते हुए सदियों तक घुमंतू रहा, वही आज सरकारी संवेदनहीनता का सबसे बड़ा शिकार है। इतिहास में जिनका स्थान “वीरों के साथी“ था। वर्तमान में उनकी पहचान “बेघर, असुविधा झेलने वाले“ के रूप में कर दी गई है। उनकी संघर्ष गाथा गर्व से पढ़ी जाती है, लेकिन उनका वर्तमान देखकर मन भीतर तक हिल जाता है।
सरकारें बदल गईं, वादे बदले, तस्वीर नहीं बदली : आजादी के दशकों बाद भी स्वच्छ भारत मिशन इनके लिए कागज़ों तक सीमित है। आवास योजनाएँ इनके पते तक नहीं पहुँचीं। नगरपालिका के शौचालय निर्माण के दावे हवा में तैर रहे हैं। ओडीएफ जिला घोषित करके रिपोर्ट में टिक लगाने वाले अधिकारी कभी इस बस्ती की तरफ देखते भी हैं ?
गाड़िया लोहार पूछ रहे हैं कि हम किससे न्याय माँगें ? महाराणा प्रताप के संघर्ष की विरासत ढोने वाले ये लोग आज भी उसी प्रतिज्ञा की तरह अपने अस्थायी घरों में जी रहे हैं, लेकिन फर्क इतना है कि तब शत्रु मुगल थे, आज उपेक्षा है। उनका सवाल बहुत सीधा है कि हम देश के नागरिक हैं या सिर्फ इतिहास का हिस्सा ?

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