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राजनीति जनसेवा है या व्यवसाय? फैसला आखिर मतदाता के हाथ में

संपादकीय | मतदाता जागरूकता

क्या राजनीति अब जनसेवा से ज्यादा स्वार्थ की राजनीति बनती जा रही है? क्या राजनीति धीरे-धीरे एक ऐसा “व्यवसाय” बनती जा रही है, जहां सेवा, विचार और सामाजिक सरोकार से अधिक सत्ता, प्रभाव और राजनीतिक समीकरण महत्वपूर्ण हो गए हैं? और यदि समाज के एक हिस्से में ऐसी धारणा पैदा हो रही है, तो इसके लिए केवल नेताओं को जिम्मेदार ठहराकर क्या मतदाता अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है?

ये सवाल किसी एक राजनीतिक दल, नेता या चुनाव से जुड़े नहीं हैं। ये लोकतंत्र की उस बुनियाद से जुड़े सवाल हैं, जिसमें अंतिम शक्ति जनता के पास होती है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां सामान्य नागरिक भी चुनाव लड़ सकता है, जनप्रतिनिधि बन सकता है और संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत सत्ता परिवर्तन में भागीदार बन सकता है। लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि स्वतंत्र, निष्पक्ष और विवेकपूर्ण मतदान में है।

जब राजनीति पेशा नहीं, जिम्मेदारी मानी जाती थी

राजनीति का मूल उद्देश्य जनसेवा और शासन व्यवस्था के माध्यम से समाज को बेहतर बनाना होना चाहिए। सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, रोजगार, सुरक्षा और विकास—ये वे विषय हैं जिनके आधार पर जनप्रतिनिधियों के काम का मूल्यांकन होना चाहिए।

लेकिन आज समाज में अक्सर यह चर्चा सुनाई देती है कि चुनाव अत्यधिक खर्चीले होते जा रहे हैं, राजनीतिक प्रभाव कुछ परिवारों या प्रभावशाली समूहों के आसपास केंद्रित हो जाता है और चुनाव जीतने के लिए धनबल तथा अन्य प्रभावों की भूमिका बढ़ती दिखाई देती है।

ऐसी धारणाएं लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय हैं।

हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि हर नेता स्वार्थी है या पूरी राजनीति व्यवसाय बन चुकी है। देश में आज भी अनेक जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता निष्ठा से जनता के बीच काम करते हैं। इसलिए पूरे राजनीतिक वर्ग को एक ही तराजू में तौलना न्यायसंगत नहीं होगा।

लेकिन सवाल पूछना भी लोकतंत्र का हिस्सा है।

क्या राजनीति में प्रवेश का उद्देश्य जनसेवा है या सत्ता प्राप्त करना?

क्या चुनाव में उम्मीदवार की योग्यता महत्वपूर्ण है या उसका धन और प्रभाव?

क्या मतदाता पांच वर्षों के काम का हिसाब देखकर मतदान करता है या चुनाव के कुछ दिनों में बनने वाले समीकरणों से प्रभावित हो जाता है?

इन सवालों पर समाज को गंभीरता से विचार करना होगा।

मतदाता भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता

हम अक्सर नेताओं को दोष देते हैं। लेकिन लोकतंत्र में नेता आखिर चुनता कौन है?

मतदाता।

अगर मतदाता स्वयं जाति, रिश्तेदारी, व्यक्तिगत पहचान, तात्कालिक लाभ, दबाव या किसी प्रकार के प्रलोभन को प्राथमिकता देकर मतदान करता है, तो बाद में केवल व्यवस्था को दोष देना समस्या का पूरा समाधान नहीं है।

मतदाता को चुनाव के समय उम्मीदवार से पूछना चाहिए—

पिछले वर्षों में उसने समाज के लिए क्या किया?

उसकी सार्वजनिक छवि और कार्यशैली कैसी रही?

क्या वह चुनाव के अलावा भी जनता के बीच दिखाई देता है?

क्या वह लोगों की समस्याएं सुनता है?

क्या उसके पास अपने क्षेत्र के विकास की स्पष्ट सोच है?

क्या वह सार्वजनिक धन और पद की जवाबदेही समझता है?और सबसे महत्वपूर्ण—क्या वह जीतने के बाद भी जनता के प्रति जवाबदेह रहेगा?

लोकतंत्र में मतदान केवल किसी व्यक्ति के नाम के आगे बटन दबाना नहीं है। यह अगले कई वर्षों के लिए अपने क्षेत्र की दिशा तय करने का निर्णय है।

अच्छे लोग राजनीति से दूर क्यों रहें?

अक्सर सुनने को मिलता है—“राजनीति बहुत खराब हो गई है, अच्छे आदमी का यहां क्या काम?”

यही सोच बदलने की आवश्यकता है।

यदि ईमानदार, शिक्षित, सक्षम, सामाजिक रूप से सक्रिय, उद्यमी, युवा, महिलाएं और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अच्छा काम करने वाले लोग राजनीति से पूरी तरह दूरी बना लेंगे, तो राजनीतिक व्यवस्था में सुधार कौन करेगा?

लोकतंत्र में राजनीति कोई निषिद्ध क्षेत्र नहीं है। राजनीति शासन और समाज के बीच सबसे महत्वपूर्ण माध्यमों में से एक है।

व्यापारी हो, किसान हो, शिक्षक हो, अधिवक्ता हो, डॉक्टर हो, मजदूर हो, युवा हो या सामाजिक कार्यकर्ता—संविधान और कानून के दायरे में प्रत्येक योग्य नागरिक को सार्वजनिक जीवन में भागीदारी का अधिकार है।

समस्या किसी व्यक्ति के व्यापारी या उद्योगपति होने में नहीं है। सवाल यह होना चाहिए कि राजनीति में आने के बाद उसका उद्देश्य जनसेवा है या निजी हित

इसी प्रकार किसी राजनीतिक परिवार से होना अपने आप में किसी को अयोग्य नहीं बनाता। लेकिन लोकतंत्र में केवल परिवार, धन या प्रभाव के आधार पर सत्ता पर स्थायी अधिकार की मानसिकता भी उचित नहीं हो सकती।

अंतिम कसौटी होनी चाहिए—योग्यता, चरित्र, कार्य, जवाबदेही और जनता का विश्वास।

खरीद-फरोख्त के आरोप लोकतंत्र को कमजोर करते हैं

भारतीय राजनीति में समय-समय पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की कथित खरीद-फरोख्त, दल-बदल और राजनीतिक सौदेबाजी के आरोप चर्चा में आते रहे हैं। प्रत्येक आरोप को प्रमाणित तथ्य मान लेना उचित नहीं है; ऐसे मामलों में तथ्य, कानून और सक्षम संस्थाओं की जांच महत्वपूर्ण होती है।

लेकिन केवल ऐसे आरोपों का बार-बार सार्वजनिक चर्चा में आना भी लोकतांत्रिक विश्वास के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

जनप्रतिनिधि जनता के मत से चुनकर आता है। मतदाता उम्मीद करता है कि उसका प्रतिनिधि जनहित, नीति और अपने विवेक के आधार पर निर्णय लेगा।

इसलिए राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और निर्वाचित प्रतिनिधियों—सभी को सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना चाहिए।

2047 का विकसित भारत और जागरूक मतदाता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य सामने रखा है।

लेकिन विकसित भारत केवल बड़ी इमारतों, चौड़ी सड़कों, उद्योगों और तकनीक से नहीं बनेगा।

विकसित भारत के लिए विकसित लोकतांत्रिक सोच भी आवश्यक है।

कल्पना कीजिए, यदि हर मतदाता उम्मीदवार चुनते समय जाति और निजी संबंध से पहले योग्यता देखे; प्रलोभन से पहले पांच वर्षों का भविष्य देखे; नारे से पहले काम देखे और राजनीतिक प्रभाव से पहले चरित्र व जवाबदेही देखे—तो भारतीय लोकतंत्र कितना मजबूत हो सकता है।

हो सकता है कि तब 2047 के लक्ष्य की दिशा में हमारी गति अपेक्षा से कहीं तेज हो।

लेकिन इसके लिए शुरुआत संसद या विधानसभा से ही हो, यह जरूरी नहीं।

शुरुआत मतदान केंद्र पर खड़े उस सामान्य नागरिक से हो सकती है, जिसकी उंगली पर चुनावी स्याही लगती है

मतदान दिवस को वास्तव में लोकतंत्र का पर्व बनाइए

मतदान दिवस लोकतंत्र का पावन पर्व है। उस दिन अमीर और गरीब के वोट की कीमत समान होती है। बड़े पद पर बैठे व्यक्ति और सामान्य नागरिक—दोनों के पास एक-एक वोट होता है।

यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।

इसलिए मतदान करते समय स्वयं से केवल एक प्रश्न पूछिए—

“जिस व्यक्ति को मैं वोट दे रहा हूं, क्या वह मेरे गांव, शहर, समाज और देश के बेहतर भविष्य के लिए सही विकल्प है?”

उत्तर यदि आपके विवेक को संतुष्ट करता है, तभी मतदान कीजिए।

न किसी के दबाव में।

न किसी प्रलोभन में।

न केवल जाति देखकर।

न केवल रिश्तेदारी देखकर।

न केवल पार्टी का नाम देखकर।

उम्मीदवार का काम, योग्यता, व्यवहार, सार्वजनिक रिकॉर्ड, नीतियां और जवाबदेही भी देखिए।

और सबसे महत्वपूर्ण—मतदान अवश्य कीजिए।

लोकतंत्र में परिवर्तन केवल नेताओं के बदलने से नहीं आता। वास्तविक परिवर्तन तब आता है, जब मतदाता के वोट देने का आधार बदलता है।

राजनीति जनसेवा रहे या स्वार्थ का माध्यम बने—इसका उत्तर केवल राजनीतिक दलों के कार्यालयों में नहीं लिखा जाएगा।

उस उत्तर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मतदान केंद्र पर मतदाता स्वयं लिखता है।

संपादकीय टिप्पणी: यह लेख निष्पक्ष मतदाता जागरूकता एवं लोकतांत्रिक विमर्श के उद्देश्य से है। इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल, उम्मीदवार, जनप्रतिनिधि, परिवार, व्यवसायी अथवा समूह के पक्ष या विपक्ष में मतदान के लिए प्रेरित करना या किसी पर अप्रमाणित आरोप लगाना नहीं है। मतदाता अपने विवेक, उपलब्ध तथ्यों और उम्मीदवारों की योग्यता के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लें।

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