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भीषण गर्मी में राहगीरों के लिए “अमृत” बना जल मंदिर, परंपरा और सेवा का अनूठा संगम

राजस्थान : भरतपुर जिले के बयाना में रेलवे स्टेशन रोड पर आदर्श नगर में बिजली घर के पास बना यह जल मंदिर लोगों में चर्चा का विषय बना हुआ है | भीषण गर्मी में जहां पर 45 डिग्री के पार है वही यह जल मंदिर राहगीर और बेजुबानों के लिए सहारा बना हुआ है |

समूचा इलाका भीषण गर्मी और लू की चपेट में है | आसमान से बरसती आग और 45 डिग्री सेल्सियस को पार करके पार के बीच जहां लोगों का घर से निकलना दुभर हो गया है, वही कामकाजी लोगों और राहगीरों के लिए इस तप्ती धुप में सफर करना किसी अग्नि परीक्षा से काम नहीं है | ऐसी विकट परिस्थितियों में स्थानीय ग्रामीण और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा शुरू किया गया ” जल मंदिर ” अर्थात सार्वजनिक प्रयोग आमजन के लिए किसी वरदान से कम साबित नहीं हो रही है |

सड़क किनारे बांस बल्लियों और छप्पर के साए में तैयार किया गया यह जल मंदिर न केवल लोगों की प्यास बुझा रहा है बल्कि हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति की वसुधैव कुटुंबकम और परोपकार की भावना को भी जीवंत कर रहा है |

देसी और आधुनिक तकनीकी का अनोखा संगम

इस जल मंदिर की सबसे खास बात इसकी बनावट और व्यवस्था है| | आमतौर पर प्याऊ में रखे मटको से पानी निकालने के लिए एक ही लोट या डंडी वाले बर्तन का इस्तेमाल होता है जिससे संक्रमण का खतरा रहता है लेकिन यह स्थानीय स्तर पर एक बेहतरीन प्रयोग किया गया है |

पीवीसी पाइप और नल कनेक्टिविटी: तस्वीर में साफ देखा जा सकता है कि मुख्य मिट्टी के बड़े घड़े (मटके) को नीचे से पीवीसी (PVC) पाइपलाइन के जरिए एक टोटी (नल) से जोड़ा गया है। इससे राहगीर बिना मटके को छुए, बेहद स्वच्छता के साथ नल खोलकर ठंडा पानी पी सकते हैं।

प्राकृतिक शीतलता (Natural Cooling): पानी को फ्रिज जैसा ठंडा रखने के लिए पारंपरिक वैज्ञानिक तरीके का इस्तेमाल किया गया है। सभी मटकों को मोटे जूट के बोरों और लाल सूती कपड़ों से ढका गया है, जिन्हें समय-समय पर गीला किया जाता है। इससे मटके का पानी बेहद शीतल और स्वास्थ्यवर्धक बना रहता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण: प्याऊ के शीर्ष पर पीले बैनर पर लाल अक्षरों में ‘जल मन्दिर’ लिखा है, जिसके साथ ‘श्री गणेशाय नमः’ और ‘जय हनुमान जी’ अंकित है। साथ ही मटकों के ठीक बीच में देवी-देवताओं का चित्र (तस्वीर) रखकर इसे एक मंदिर का स्वरूप दिया गया है, जो सनातन संस्कृति में जल को भगवान मानने की परंपरा को दर्शाता है।

“जल सेवा ही सबसे बड़ी पूजा” — स्थानीय लोग

इस पहल को शुरू करने वाले स्थानीय युवाओं और भामाशाहों का कहना है कि इस भीषण गर्मी में किसी प्यासे को पानी पिलाने से बड़ा कोई पुण्य नहीं है।

“प्रशासन अपनी तरफ से इंतजाम करता है, लेकिन एक नागरिक होने के नाते हमारा भी फर्ज है कि हम अपने सामर्थ्य के अनुसार सड़कों पर निकलने वाले मजदूरों, राहगीरों और रेहड़ी-पटरी वालों के लिए पानी का प्रबंध करें। इस जल मंदिर में सुबह-शाम साफ और शुद्ध पानी भरा जाता है ताकि किसी को भी दूषित पानी न पीना पड़े।”

राहगीरों ने भी इस व्यवस्था की जमकर तारीफ की है। एक राहगीर ने बताया, “इस रूट पर दूर-दूर तक कोई दुकान या पानी की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में यह नल वाला जल मंदिर देखकर जान में जान आ जाती है। मटके का पानी इतना ठंडा और मीठा है कि तृप्ति मिल जाती है।”

बेजुबान पक्षियों के लिए भी विशेष इंतजाम

इस जल मंदिर की संवेदनशीलता सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है। तस्वीर के दाहिनी ओर साफ देखा जा सकता है कि एक पेड़/पौधे के पास मिट्टी का सकोरा (परिंडा) लटकाया गया है। भीषण गर्मी में जब जलस्रोत सूख जाते हैं, तब इन परिंडों में नियमित रूप से पानी भरकर बेजुबान पक्षियों की प्यास बुझाने का भी सराहनीय प्रयास किया जा रहा है।

निष्कर्ष और संदेश

यह ‘जल मंदिर’ इस बात का साक्षात उदाहरण है कि अगर समाज में इच्छाशक्ति हो, तो बिना किसी बड़े बजट के भी आम आदमी की बुनियादी समस्याओं को दूर किया जा सकता है। मिट्टी की सोंधी खुशबू और नल की आधुनिक सुविधा से लैस यह प्याऊ राहगीरों को न केवल शीतलता प्रदान कर रहा है, बल्कि समाज को आपस में जोड़ने का काम भी कर रहा है। इस तरह के प्रयास हर मुख्य चौराहे और ग्रामीण इलाकों में होने चाहिए ताकि इस जानलेवा गर्मी में किसी भी व्यक्ति या पशु-पक्षी की मौत पानी की कमी से न हो।

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आपका सनातनी संत रिपोर्टर

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