बयाना/भरतपुर: सनातनी संत रिपोर्टर
भरतपुर जिले के बंद बरेठा अभ्यारणस जुड़े 140 गांव के भविष्य को लेकर शनिवार कोआयोजित महापंचायत में ग्रामीणका गुस्सा खुल कर सामने आया। महापंचायत में क्षेत्रभर से हजारों ग्रामीण, जनप्रतिनिधि, किसान, पशुपालक और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। सभा में ग्रामीणों ने वन विभाग की नीतियों पर नाराजगी जताते हुए सरकार से अभयारण्य सीमा में शामिल 140 गांवों को बाहर करने, वर्षों से लंबित समस्याओं का समाधान करने और लीज भूमि ग्रामीणों को वापस सौंपने की मांग की।
महापंचायत के दौरान ग्रामीणों का आक्रोश खुलकर सामने आया। वक्ताओं ने कहा कि अभयारण्य की सीमाओं में शामिल होने के कारण ग्रामीण वर्षों से अनेक प्रतिबंधों और परेशानियों का सामना कर रहे हैं। खेती, मकान निर्माण, सड़क, बिजली, पानी तथा अन्य विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उनके अधिकारों की लगातार अनदेखी की जा रही है, जिससे क्षेत्र के विकास पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
सभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर राज्य सरकार और वन विभाग से मांग की गई कि बांध बारैठा अभयारण्य की सीमा में शामिल 140 गांवों को अभयारण्य क्षेत्र से बाहर किया जाए। ग्रामीणों का तर्क है कि इन गांवों को अभयारण्य सीमा में रखने से स्थानीय लोगों के जीवन और आजीविका पर संकट खड़ा हो गया है। यदि गांवों को सीमा से बाहर किया जाता है तो ग्रामीणों को राहत मिलेगी और विकास कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर हो सकेंगी।
महापंचायत में वन विभाग द्वारा लीज के नाम पर अधिग्रहित की गई भूमि का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। ग्रामीणों ने कहा कि वर्षों पहले जिन जमीनों को विभिन्न कारणों से अधिग्रहित किया गया था, उन्हें वापस संबंधित गांवों के लोगों को सौंपा जाए। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि कई परिवार आज भी अपनी जमीन के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में सरकार को मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए उनकी समस्याओं का समाधान करना चाहिए।
बैठक में मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से निकलकर क्षेत्र में लगातार देखे जा रहे चीतों और अन्य वन्यजीवों का विषय भी चर्चा का केंद्र रहा। ग्रामीणों ने कहा कि वन्यजीवों की बढ़ती गतिविधियों के कारण लोगों में भय का माहौल बना हुआ है। खेतों में काम करने वाले किसान और पशुपालक लगातार चिंता में रहते हैं। कई बार वन्यजीवों की मौजूदगी से जनहानि और पशुधन को नुकसान होने का खतरा बना रहता है।
ग्रामीणों ने मांग की कि क्षेत्र में घूम रहे चीतों और अन्य वन्यजीवों का सुरक्षित रेस्क्यू कर उन्हें उनके मूल वन क्षेत्र में पहुंचाया जाए। उनका कहना था कि वन्यजीव संरक्षण महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ-साथ ग्रामीणों की सुरक्षा और आजीविका की रक्षा करना भी सरकार और वन विभाग की जिम्मेदारी है। यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में गंभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
महापंचायत में मौजूद वक्ताओं ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार ने जल्द सकारात्मक निर्णय नहीं लिया तो आंदोलन को व्यापक स्वरूप दिया जाएगा। ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि यह केवल जमीन या अभयारण्य सीमा का मुद्दा नहीं है, बल्कि हजारों परिवारों के भविष्य, रोजगार और जीवन से जुड़ा हुआ प्रश्न है। इसलिए सरकार को उनकी मांगों को गंभीरता से लेना चाहिए।
सभा में यह भी निर्णय लिया गया कि आगामी आंदोलन की रणनीति तय करने के लिए 26 जून को खुशपुरा गांव में दूसरी महापंचायत आयोजित की जाएगी। इस महापंचायत में आगे की कार्ययोजना तैयार की जाएगी और सरकार के रुख के आधार पर आंदोलन को तेज करने पर विचार किया जाएगा। ग्रामीणों ने कहा कि यदि उनकी मांगों की अनदेखी जारी रही तो वे बड़े स्तर पर जनआंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे।
महापंचायत देर शाम तक चली, जिसमें क्षेत्र के अनेक गांवों के प्रतिनिधि और हजारों ग्रामीण मौजूद रहे। आयोजन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल भी तैनात रहा। पूरे कार्यक्रम में ग्रामीणों ने शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखी और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुटता का संदेश दिया। महापंचायत के अंत में ग्रामीणों ने संकल्प लिया कि वे अपने गांवों, जमीनों और भविष्य से जुड़े इस मुद्दे पर संगठित रहकर संघर्ष जारी रखेंगे तथा सरकार से न्याय मिलने तक अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे।
यहां पहुंचकर के हमारे सनातनी संत रिपोर्टर ने लोगों से बात की तो उसमे अलग-अलग प्रतिक्रिय निकाल करके आई।
क्षेत्र के युवा नेता एवं शेर गुर्जर का खास इंटरव्यू
अब आप देखिए प्रहलाद खटाना का इटरव्यू

