पश्चिम एक्सप्रेस में मजदूर गंगा सिंह ने सुनाई परेशानी, स्वर्ण मंदिर मेल में महिला यात्री शौचालय तक नहीं पहुंच सकी; यात्रियों ने जनरल कोच बढ़ाने और ‘जनता एक्सप्रेस’ चलाने की मांग की
मथुरा (उत्तर प्रदेश)/बयाना (राजस्थान), 18 सितंबर 2026। लंबी दूरी की ट्रेनों के जनरल डिब्बों में क्षमता से अधिक भीड़ आम यात्रियों के लिए गंभीर समस्या बनती जा रही है। हालात ऐसे हैं कि जनरल टिकट लेकर यात्रा करने वाले लोगों को डिब्बे में पैर रखने तक की जगह नहीं मिल रही। मजबूरी में वे आरक्षित स्लीपर कोच में जाते हैं तो उन्हें अतिरिक्त किराया अथवा चालान भरना पड़ता है। वहीं जनरल डिब्बों की भीड़ स्लीपर कोचों तक पहुंचने से आरक्षित यात्रियों, विशेषकर महिलाओं को भी परेशानी उठानी पड़ रही है।

मथुरा रेलवे स्टेशन और बयाना-मथुरा रेलमार्ग पर सनातनी संत रिपोर्टर द्वारा की गई ग्राउंड रिपोर्ट में दो अलग-अलग ट्रेनों में लगभग एक जैसी स्थिति सामने आई। सुबह मुंबई से अमृतसर की ओर जा रही स्वर्ण मंदिर मेल में महिला यात्रियों की परेशानी सामने आने के बाद शाम को अमृतसर से मुंबई की ओर जा रही पश्चिम एक्सप्रेस में स्थिति का क्रॉस-चेक किया गया। दूसरी ट्रेन में भी जनरल कोच के दरवाजे और गलियारे तक भारी भीड़ मिली।
स्वर्ण मंदिर मेल में महिला यात्री को हुई परेशानी
स्वर्ण मंदिर मेल के आरक्षित स्लीपर कोच संख्या S-6 में बोरीवली से मथुरा की यात्रा कर रही एक महिला अपने परिवार के साथ सीट संख्या 1 से 6 पर यात्रा कर रही थी। बयाना से मथुरा के बीच कोच में अत्यधिक भीड़ होने के कारण महिला को शौचालय तक जाने में परेशानी हुई।
महिला और उसके साथ यात्रा कर रहे यात्रियों ने बताया कि गलियारे तथा शौचालय के आसपास बड़ी संख्या में लोग खड़े और बैठे हुए थे। इसके कारण रास्ता लगभग बंद हो गया था। महिला यात्री चाहकर भी शौचालय तक नहीं पहुंच सकी।
यात्रियों ने आरोप लगाया कि रात के समय स्थिति और गंभीर हो जाती है। लोग शौचालयों के दरवाजे तक बैठ जाते हैं, जिससे महिला यात्रियों को काफी असुविधा, असुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
आरक्षित यात्रियों का कहना था कि वे स्लीपर कोच का पूरा किराया चुका रहे हैं, लेकिन भीड़ के कारण न अपनी सीट पर ठीक से बैठ पा रहे हैं और न ही आराम कर पा रहे हैं। कोच के अंदर एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना भी मुश्किल हो रहा था।
यात्रियों ने रेलवे प्रशासन को ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के बाद रेलवे सुरक्षा बल के जवान कोच में पहुंचे और व्यवस्था संभालने का प्रयास किया।
पश्चिम एक्सप्रेस में भी दिखाई दी वैसी ही भीड़

स्वर्ण मंदिर मेल में सामने आई स्थिति के बाद शाम को पश्चिम एक्सप्रेस के जनरल और स्लीपर कोचों की स्थिति देखी गई। इसका उद्देश्य यह जानना था कि क्या भीड़ केवल एक ट्रेन तक सीमित थी।
मथुरा रेलवे स्टेशन और मथुरा से बयाना के बीच पश्चिम एक्सप्रेस के जनरल कोच में भी दरवाजे से लेकर अंदर के गलियारे तक यात्री खड़े दिखाई दिए। खिड़कियों और सीटों के आसपास भी काफी भीड़ थी। डिब्बे में प्रवेश करना, बाहर निकलना और एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचना मुश्किल नजर आया।
दो विपरीत दिशाओं में चलने वाली ट्रेनों में लगभग एक जैसी स्थिति मिलना यह संकेत देता है कि समस्या को किसी एक ट्रेन या एक दिन की घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जनरल टिकट लेकर सूरत जा रहे थे गंगा सिंह
पश्चिम एक्सप्रेस में मजदूरी करने वाले गंगा सिंह जनरल श्रेणी का टिकट लेकर सूरत जाने के लिए यात्रा कर रहे थे। गंगा सिंह के अनुसार जनरल बोगी में इतनी अधिक भीड़ थी कि उनके लिए सुरक्षित तरीके से खड़े रहना भी मुश्किल हो गया।
उन्होंने बताया कि दरवाजे से लेकर अंदर तक यात्री ठसाठस भरे हुए थे। लंबे सफर के दौरान ऐसी भीड़ में यात्रा करने पर उन्हें अपनी जान का खतरा महसूस हुआ। सुरक्षित स्थान की तलाश में वह मजबूरी में स्लीपर कोच में चले गए।
गंगा सिंह का कहना है कि स्लीपर कोच में पहुंचने पर टीटीई ने उनका चालान कर दिया और उन्हें करीब 720 रुपये अतिरिक्त चुकाने पड़े। उन्होंने सवाल उठाया कि उनके पास रेलवे द्वारा जारी जनरल टिकट था, लेकिन जब जनरल डिब्बे में खड़े होने तक की जगह नहीं थी तो वह आखिर कहां जाते?
दिहाड़ी मजदूरी करने वाले व्यक्ति के लिए सैकड़ों रुपये का अतिरिक्त भुगतान बड़ा आर्थिक बोझ है। गंगा सिंह की परेशानी जनरल श्रेणी में यात्रा करने वाले लाखों मजदूरों और सामान्य यात्रियों की समस्या को सामने रखती है।
जनरल में रहें तो जान का खतरा, स्लीपर में जाएं तो चालान
गंगा सिंह का मामला आम रेल यात्री के सामने मौजूद दोहरी परेशानी को उजागर करता है। जनरल कोच में सफर करने पर यात्री को अत्यधिक भीड़, धक्का-मुक्की और दुर्घटना के खतरे का सामना करना पड़ता है। यदि वह अपनी सुरक्षा के लिए स्लीपर कोच में चला जाए तो उसे अतिरिक्त किराया अथवा चालान भरना पड़ता है।
यात्रियों का कहना है कि टिकट और श्रेणी से जुड़े नियमों का पालन आवश्यक है, लेकिन रेलवे को उन परिस्थितियों पर भी ध्यान देना चाहिए जिनके कारण जनरल टिकट वाला व्यक्ति स्लीपर कोच में जाने के लिए मजबूर होता है। केवल चालान करने से मूल समस्या का समाधान नहीं होगा।
जनरल यात्री को उसके टिकट के अनुसार सुरक्षित यात्रा की सुविधा मिलनी चाहिए। इसके साथ ही आरक्षित स्लीपर यात्रियों की सीट और सुविधाओं की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
भीड़ बन सकती है सुरक्षा के लिए खतरा
यात्रा के दौरान रिकॉर्ड किए गए वीडियो में जनरल बोगी के दरवाजे, खिड़कियां और अंदर के गलियारे तक यात्रियों से भरे दिखाई दिए। लोग एक-दूसरे से सटे हुए खड़े थे। ऐसे में अचानक किसी यात्री की तबीयत बिगड़ने, किसी बच्चे या बुजुर्ग को बाहर निकालने अथवा किसी आपात स्थिति में सुरक्षित निकासी करना मुश्किल हो सकता है।
दरवाजे तक भीड़ होने से चलती ट्रेन से यात्री के गिरने का खतरा भी बना रहता है। महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, बीमार और दिव्यांग यात्रियों के लिए ऐसी परिस्थितियों में यात्रा करना ज्यादा कठिन हो जाता है।
यात्रियों का कहना है कि जनरल कोच की भीड़ केवल असुविधा का विषय नहीं, बल्कि यात्री सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला है।
जनरल की भीड़ स्लीपर कोच तक क्यों पहुंचती है?
यात्रियों के अनुसार लंबी दूरी की कई ट्रेनों में जनरल डिब्बों की संख्या यात्रियों की वास्तविक मांग की तुलना में कम होती है। दूसरी ओर बड़ी संख्या में जनरल टिकट जारी हो जाते हैं। डिब्बे भरने के बाद यात्री मजबूरी में स्लीपर कोचों की ओर चले जाते हैं।
स्लीपर श्रेणी में अत्यधिक प्रतीक्षा सूची भी भीड़ का दबाव बढ़ाती है। जरूरी काम या आपात स्थिति के कारण कई वेटिंग टिकट वाले यात्री ट्रेन में चढ़ जाते हैं। इसके बाद आरक्षित यात्रियों को अपनी बर्थ, गलियारे और शौचालय तक पहुंचने में परेशानी होने लगती है।
इस व्यवस्था में जनरल और स्लीपर—दोनों श्रेणियों के यात्री परेशान होते हैं। जनरल यात्री को जगह नहीं मिलती, जबकि स्लीपर का पूरा किराया देने वाले यात्री को अपनी आरक्षित सीट का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
यात्रियों ने बताया क्या हो सकता है समाधान
यात्रियों से जब पूछा गया कि इस समस्या का समाधान क्या हो सकता है और वे सरकार से क्या चाहते हैं, तो उन्होंने कहा कि रेलवे को आधुनिक तथा तेज रफ्तार ट्रेनों के साथ सामान्य यात्रियों की जरूरतों पर भी ध्यान देना चाहिए।
यात्रियों ने कहा कि वंदे भारत जैसी आधुनिक ट्रेनों का संचालन देश के विकास के लिए अच्छी पहल है, लेकिन गरीब और मध्यमवर्गीय यात्रियों का बड़ा वर्ग ऐसी ट्रेनों का किराया नियमित रूप से वहन नहीं कर सकता।
मजदूर, किसान, छोटे व्यापारी और सामान्य परिवार रोजगार, उपचार, पारिवारिक कार्य अथवा किसी आपात स्थिति में 10 से 20 घंटे तक का लंबा सफर जनरल या साधारण स्लीपर श्रेणी में करते हैं। इसलिए आधुनिक ट्रेनों के साथ-साथ जनरल और स्लीपर कोचों की संख्या बढ़ाना भी जरूरी है।
क्षमता के अनुसार जारी हों टिकट
यात्रियों का कहना है कि जब ट्रेन में जनरल डिब्बे कम हों और टिकट अत्यधिक संख्या में जारी कर दिए जाएं तो ऐसी भीड़ होना स्वाभाविक है। रेलवे को प्रत्येक ट्रेन की उपलब्ध क्षमता और उस मार्ग पर यात्रा करने वाले लोगों की औसत संख्या का आकलन करना चाहिए।
जनरल टिकटों की संख्या को उपलब्ध क्षमता से जोड़ने की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि किसी मार्ग पर यात्रियों की संख्या अधिक है तो अतिरिक्त जनरल कोच लगाए जाएं अथवा विशेष ट्रेन चलाई जाए।
स्लीपर श्रेणी में प्रतीक्षा सूची की भी उचित अधिकतम सीमा निर्धारित की जानी चाहिए। अत्यधिक वेटिंग होने पर अतिरिक्त कोच लगाने की व्यवस्था की जाए, ताकि आरक्षित कोचों में अनियंत्रित भीड़ न बढ़े।
‘जनता एक्सप्रेस’ चलाने की मांग
यात्रियों ने अधिक भीड़ वाले रेलमार्गों पर सामान्य यात्रियों के लिए अलग से ‘जनता एक्सप्रेस’ जैसी ट्रेनें चलाने का सुझाव दिया। इन ट्रेनों में अधिकतर डिब्बे जनरल और साधारण स्लीपर श्रेणी के हों तथा किराया गरीब और मध्यमवर्गीय यात्रियों की पहुंच में रखा जाए।
जिन मार्गों पर मजदूरों और सामान्य यात्रियों की संख्या अधिक रहती है, वहां अधिक जनरल डिब्बों वाली ट्रेनें चलाने से स्लीपर कोचों पर भीड़ का दबाव कम हो सकता है।
दो राज्यों और दो रेल मंडलों से जुड़ी रिपोर्ट
यह ग्राउंड रिपोर्ट उत्तर प्रदेश और राजस्थान के बीच की गई। मथुरा जंक्शन उत्तर मध्य रेलवे के आगरा रेल मंडल के अंतर्गत आता है, जबकि बयाना जंक्शन पश्चिम मध्य रेलवे के कोटा रेल मंडल में शामिल है।
यात्रियों ने मांग की कि आगरा और कोटा रेल मंडल इस रेलमार्ग पर यात्रा करने वाले जनरल तथा स्लीपर यात्रियों की संख्या का आकलन करें। भीड़ वाले समय और ट्रेनों की पहचान कर अतिरिक्त कोच लगाने तथा सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की आवश्यकता है।
यात्रियों की प्रमुख मांगें
- लंबी दूरी की ट्रेनों में जनरल बोगियों की संख्या बढ़ाई जाए।
- अधिक भीड़ वाले मार्गों पर जनरल कोच वाली ‘जनता एक्सप्रेस’ चलाई जाए।
- जनरल टिकटों की संख्या उपलब्ध क्षमता के अनुसार निर्धारित की जाए।
- स्लीपर श्रेणी में प्रतीक्षा सूची की उचित अधिकतम सीमा तय की जाए।
- अत्यधिक वेटिंग होने पर अतिरिक्त कोच या विशेष ट्रेन चलाई जाए।
- आरक्षित कोचों में नियमित टिकट जांच और भीड़ प्रबंधन किया जाए।
- महिलाओं के लिए शौचालय तक सुरक्षित और खुला रास्ता सुनिश्चित किया जाए।
- प्रमुख स्टेशनों और भीड़ वाले रेलखंडों पर आरपीएफ की तैनाती बढ़ाई जाए।
- गरीब और मजदूर यात्रियों की मजबूरी को देखते हुए मानवीय समाधान दिया जाए।
- आगरा तथा कोटा रेल मंडल इस मार्ग की यात्री मांग का संयुक्त आकलन करें।
सुरक्षित यात्रा भी रेलवे के विकास का हिस्सा
यात्रियों का कहना है कि रेलवे का विकास केवल नई, आधुनिक और तेज रफ्तार ट्रेनें चलाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। गरीब और मध्यमवर्गीय यात्री को भी सुरक्षित, सम्मानजनक तथा सुविधाजनक यात्रा उपलब्ध कराना विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जनरल टिकट लेकर सफर करने वाला व्यक्ति भी रेलवे का वैध यात्री है। उसे जान जोखिम में डालकर यात्रा करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। दूसरी ओर स्लीपर का पूरा किराया देने वाले यात्रियों की सीट और सुविधाएं भी सुरक्षित रहनी चाहिए।
इस समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव है जब रेलवे यात्रियों की वास्तविक मांग के अनुसार जनरल और स्लीपर डिब्बों की संख्या बढ़ाए तथा टिकटों की संख्या और उपलब्ध क्षमता के बीच संतुलन स्थापित करे।
मथुरा रेलवे स्टेशन और बयाना-मथुरा रेलमार्ग पर सामने आई परिस्थितियां एक गंभीर सवाल छोड़ती हैं—जनरल बोगी में जगह नहीं, स्लीपर में जाने पर चालान और आरक्षित कोच में महिलाओं के लिए शौचालय तक रास्ता नहीं; आखिर आम यात्री जाए तो कहां?
ग्राउंड रिपोर्ट: सुरेंद्र सिंह
सनातनी संत रिपोर्टर
नोट: गंगा सिंह से वसूली गई करीब 720 रुपये की राशि उनके बयान पर आधारित है। खबर यात्रा के दौरान रिकॉर्ड किए गए वीडियो, उपलब्ध तस्वीरों और यात्रियों द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। रेलवे प्रशासन का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
