विशेष खोजी रिपोर्ट: आस्था के तमाशे और खोखले संस्कार
(🙏🏻 इस लेख के माध्यम से समाज को जागरूक करना मेरा मुख्य उद्देश्य है। सनातनी संत रिपोर्टर किसी की भावना को आहत नहीं करना चाहता। धर्म की रक्षा के लिए कड़वी सच्चाई को समाज के सामने लाना जरूरी हो गया है क्योंकि धर्म के अंदर अज्ञानियों का प्रवेश हो चुका है और धर्म को व्यापार बना दिया है। )
बढ़ते कथा पंडालों के बीच घटती मर्यादाएँ; क्या धर्म केवल पाखंड बनकर रह गया है?
आज देश के कोने-कोने में, हर गली-मोहल्ले और चौराहों पर धर्म का एक अद्भुत और भव्य रूप देखने को मिल रहा है। कहीं श्रीमद्भागवत कथा के आलीशान वाटरप्रूफ पंडाल सजे हैं, तो कहीं करोड़ों की लागत से भव्य महायज्ञ और जगराते (जगमग रोशनियाँ) हो रहे हैं। चारों तरफ लाउडस्पीकरों पर भजनों की गूंज है, पंडालों में पैर रखने की जगह नहीं है और ऐसा प्रतीत होता है कि पूरा समाज भक्ति के सागर में सराबोर है।
परंतु, जैसे ही हम इस भव्यता के पर्दे को हटाकर समाज के भीतर झांकते हैं, तो एक भयावह और कड़वी सच्चाई सामने आती है। धर्म के इस महा-उत्सव के समानांतर ही समाज में भ्रष्टाचार, अनैतिकता, अपराध और पारिवारिक विघटन की बाढ़ आई हुई है। जो लोग दिन में कथा के पंडालों में बैठकर आंसू बहाते हैं, वही शाम को अपने घरों में मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाते नजर आते हैं। माता-पिता को वृद्धाश्रम भेजा जा रहा है, भाई-भाई के खून का प्यासा है, और बहन-बेटी के अधिकार छीने जा रहे हैं।
आखिर ऐसा क्यों है कि धर्म का प्रचार तो बढ़ रहा है, लेकिन इंसान का चरित्र गिरता जा रहा है? इसका सीधा उत्तर हमारे शास्त्रों में बहुत पहले ही दे दिया गया था। आज का यह परिदृश्य सीधे तौर पर ‘पाखंड और दिखावे’ का धर्म है, जिससे शास्त्रों का शुद्ध ज्ञान पूरी तरह गायब हो चुका है।
१. कलयुग का कड़वा सच: “कथावक्ता गृहे गृहे“
श्रीमद्भागवत महापुराण के महात्म्य (पद्म पुराण) में देवर्षि नारद ने कलयुग के लक्षणों का वर्णन करते हुए जो कहा था, वह आज अक्षरशः सच साबित हो रहा है। आज कथा कहना आत्म-कल्याण या समाज सुधार का माध्यम नहीं, बल्कि एक कॉर्पोरेट व्यवसाय बन चुका है। शास्त्र कहते हैं:
विप्रा वेदविहीनाश्च कुतीर्थप्रतिग्रहाः।
लोभमोहात्मकाश्चैव कथावक्ता गृहे गृहे॥
(श्रीमद्भागवत महात्म्य, १.३१)
व्याख्या और वर्तमान स्थिति:
आज वेद और शास्त्रों के शुद्ध ज्ञान से हीन, केवल मनोरंजन और धन कमाने की लालसा रखने वाले लोग कथावाचक बन बैठे हैं। लोभ और मोह में डूबे ये तथाकथित संत और आयोजक धर्म को एक व्यापार की तरह बेच रहे हैं। ‘गृहे गृहे’ यानी आज गली-गली, घर-घर में कथाएँ तो हो रही हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल चढ़ावा इकट्ठा करना, अपनी राजनीतिक या सामाजिक साख बढ़ाना और जनता को अपनी बातों के जाल में फंसाना रह गया है। यही कारण है कि सात दिन की कथा सुनने के बाद भी श्रोता के जीवन में तनिक भी बदलाव नहीं आता।
२. मर्यादाओं का पतन और पारिवारिक बिखराव
आज समाज में सबसे बड़ा संकट ‘रिश्तों की मर्यादा’ का है। जिस देश में राम ने पिता के वचनों के लिए राजपाठ त्याग दिया और भरत ने भाई के प्रेम में खड़ाऊं को सिंहासन पर रख दिया, उसी देश में आज संपत्ति के छोटे से टुकड़े के लिए भाई, भाई की हत्या कर रहा है। माता-पिता को बोझ समझा जा रहा है।
तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के उत्तरकांड में काकभुशुंडि जी के मुख से कलयुग के इस पारिवारिक और सामाजिक पतन का हुबहू चित्रण करवाया है:
सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाखंड।
मानस कहुँ प्रगट कीन्हेसि ब्रह्मंड॥
आज पूरे ब्रह्मांड और मानव मन पर कपट, हठ, अहंकार, द्वेष और पाखंड का राज है। लोग बाहर से धार्मिक होने का नाटक (दंभ) करते हैं, लेकिन भीतर द्वेष और कपट भरा है। इसके आगे वे लिखते हैं कि कलयुग में लोग अपने सगे माता-पिता और पत्नी-बच्चों तक का अनादर करेंगे। लोग केवल वासना और धन के गुलाम हो चुके हैं। कथा के पंडालों में ‘राधे-राधे’ चिल्लाने वाली भीड़ घर जाते ही अपनों के प्रति हिंसक और लालची हो जाती है, क्योंकि उन्हें शास्त्रों का मर्म नहीं, केवल मनोरंजन परोसा जा रहा है।
३. तामसी धर्म का बोलबाला: केवल दिखावा और भ्रष्टाचार
आज यज्ञ, हवन और कथाओं के आयोजन के लिए जो चंदा इकट्ठा किया जाता है, उसमें से एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार और अनैतिक माध्यमों से कमाए गए धन का होता है। भ्रष्ट अधिकारी, मिलावटखोर व्यापारी और जनता को ठगने वाले लोग इन पंडालों के मुख्य अतिथि और वीआईपी श्रोता होते हैं। वे सोचते हैं कि थोड़ा सा दान देकर वे अपने पापों को धो लेंगे।
इस झूठे और दिखावे के धर्म पर प्रहार करते हुए श्रीरामचरितमानस में कहा गया है:
तामस धर्म करहिं नर जपतप ब्रत मख दान।
देव न बरषहिं धरनी बए न जामहिं धान॥
वर्तमान संदर्भ:
आज जो जप, तप, व्रत, यज्ञ (मख) और दान हो रहे हैं, वे ‘तामसी’ हैं। तामसी धर्म का अर्थ है—वह धार्मिक कार्य जो केवल घमंड दिखाने, दूसरों को नीचा दिखाने या अपने काले कारनामों को छुपाने के लिए किया जाए। जब धर्म का स्वरूप इतना अशुद्ध और पाखंडी हो जाएगा, तो प्रकृति भी कुपित होगी। आज जो असमय मौसम का बदलना, अकाल, और धरती की उपजाऊ क्षमता का घटना हम देख रहे हैं, वह इसी तामसी आचरण का परिणाम है।
४. पाखंडियों के मायाजाल के खिलाफ जागने का समय
सच्चा धर्म पंडालों की भव्यता, लाखों के साउंड सिस्टम और कथावाचकों के आलीशान पहनावे में नहीं है। सच्चा धर्म ‘आचरण’ में है।
शास्त्रों का शुद्ध ज्ञान लुप्त: आज की कथाओं में गंभीर आध्यात्मिक चर्चा, वेदांत, उपनिषद या नैतिक कर्तव्यों (जैसे माता-पिता की सेवा, ईमानदारी, सामाजिक न्याय) पर बात नहीं होती। इसके बजाय चुटकुले, नाच-गाना और अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जाता है, ताकि भीड़ जुटी रहे।
भीड़ का मनोविज्ञान: जनता भी आत्म-मंथन नहीं करना चाहती। वह केवल अपनी सुख-समृद्धि की मन्नत मांगने या मनोरंजन के लिए वहाँ जाती है।
बदलाव की आवश्यकता
यदि हमें समाज को बचाना है, तो इस धार्मिक पाखंड के खिलाफ एक वैचारिक युद्ध छेड़ना होगा। हमें यह समझना होगा कि:
माता-पिता को रोता छोड़कर कथा सुनने जाना व्यर्थ है।
भ्रष्टाचार की कमाई से करोड़ों का जगराता या यज्ञ कराना साक्षात् पाप है।
भाई का हक मारकर दानवीर कहलाना केवल दंभ है।
जब तक धर्म हमारे आंतरिक चरित्र को शुद्ध नहीं करता, तब तक पंडालों की यह बढ़ती संख्या केवल एक सामाजिक दिखावा और मनोरंजन का साधन मात्र बनी रहेगी। अब समय आ गया है कि हम पाखंडी गुरुओं और व्यावसायिक आयोजनों को नकारें और श्रीरामचरितमानस तथा भागवत के उस मूल संदेश को पहचानें जो हमें एक सच्चा, मर्यादित और संवेदनशील इंसान बनना सिखाता है।
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